हजारीबाग। हिंदी पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक योगदान के रूप में हंसराज चौरसिया की बहुप्रतीक्षित पुस्तक संपादकीय लेखन: पत्रकारिता की आत्मा और कलम की ज़िम्मेदारी शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही है। इस पुस्तक का प्रकाशन परिमल प्रकाशन द्वारा किया जा रहा है। यह पुस्तक समाचार पत्रों में संपादकीय लेखन की अवधारणा, तकनीक, नैतिकता और डिजिटल युग की चुनौतियों पर एक समग्र एवं व्यवस्थित मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है। प्रकाशक के अनुसार, यह कृति पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, मीडिया पेशेवरों तथा UPSC एवं PSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी। पुस्तक में संपादकीय की परिभाषा, उद्देश्य और ऐतिहासिक विकास से लेकर उसके सामाजिक एवं लोकतांत्रिक महत्व तक का विस्तार से विवेचन किया गया है। लेखक ने संपादकीय को केवल समाचार पत्र का एक स्तंभ न मानकर जनमत निर्माण की प्रभावशाली विधा के रूप में प्रस्तुत किया है। विश्लेषणात्मक, सुझावात्मक, आलोचनात्मक, प्रेरणात्मक तथा आपातकालीन संपादकीय लेखन की विभिन्न शैलियों को उदाहरण सहित समाहित किया गया है। इस पुस्तक के सह-संपादक डॉ. साकेत कुमार पाठक हैं, जिनका अकादमिक अनुभव पुस्तक को शोधपरक दृष्टि प्रदान करता है। वहीं, पुस्तक की शब्द सज्जा का दायित्व चंदन तिवारी, मो. फ़ज़ल और विक्की कुमार धान ने निभाया है, जिससे कृति की भाषा-शैली और प्रस्तुति को परिष्कृत एवं प्रभावी रूप मिला है। वही पुस्तक में विषय चयन, तथ्य-संग्रह, तार्किक विश्लेषण, भाषा-शैली, शीर्षक निर्माण तथा निष्कर्ष की संरचना जैसे व्यावहारिक पक्षों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। साथ ही, संपादन, पुनर्लेखन और लेखन अनुशासन की प्रक्रिया को कार्यशाला शैली में प्रस्तुत किया गया है। डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए SEO आधारित संपादकीय लेखन, ब्लॉग एवं वेब पोर्टल्स की भूमिका तथा सोशल मीडिया में संपादकीय विमर्श जैसे समकालीन विषयों को भी शामिल किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुस्तक हिंदी पत्रकारिता में संपादकीय लेखन पर एक महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक योगदान सिद्ध हो सकती है। पुस्तक शीघ्र ही देशभर के प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं एवं ऑनलाइन मंचों पर उपलब्ध होगी।
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