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एंबुलेंस नहीं मिली तो थैले में मासूम बेटे का शव लेकर गांव पहुंचा आदिवासी पिता, चाईबासा की घटना ने झकझोरा

On: December 20, 2025 11:59 AM
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झारखंड सरकार भले ही बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और आदिवासी कल्याण के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की सच्चाई को बेनकाब कर देती है। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा से सामने आया है, जहां एक बेबस आदिवासी पिता को अपने चार साल के मासूम बेटे का शव थैले में रखकर गांव तक ले जाना पड़ा।

सदर अस्पताल में तोड़ा दम, पिता को नहीं मिली एंबुलेंस

घटना चाईबासा सदर अस्पताल की है। नोवामुण्डी के बालजोड़ी गांव निवासी डिम्बा चातोम्बा अपने चार वर्षीय बेटे को गंभीर हालत में इलाज के लिए दो दिन पहले सदर अस्पताल लेकर पहुंचे थे। अस्पताल में बच्चे का इलाज चल रहा था, लेकिन शुक्रवार (19 दिसंबर) को इलाज के दौरान मासूम ने दम तोड़ दिया। बेटे की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

घंटों गुहार लगाता रहा पिता, लेकिन सिस्टम ने नहीं सुनी आवाज

बेटे की मौत के बाद डिम्बा चातोम्बा ने अस्पताल प्रशासन से शव को गांव ले जाने के लिए एंबुलेंस की मांग की। वह घंटों तक अस्पताल परिसर में एंबुलेंस का इंतजार करता रहा, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। न अस्पताल प्रबंधन आगे आया और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई। डिम्बा के पास न तो निजी वाहन था और न ही इतने पैसे कि वह किसी और साधन से शव ले जा सके।

सरकारी सिस्टम से हारकर थैले में रखा बेटे का शव

अंततः सरकारी व्यवस्था और अस्पताल के सिस्टम से हार मानकर डिम्बा चातोम्बा ने अपने चार वर्षीय बेटे के शव को एक थैले में रखा और चाईबासा सदर अस्पताल से नोवामुण्डी के बालजोड़ी गांव तक का लंबा सफर तय किया। यह दृश्य मानवता को शर्मसार करने वाला था।

रास्ते में जिसने देखा, उसकी आंखें भर आईं

जब डिम्बा अपने बेटे का शव लेकर गांव की ओर जा रहा था, तो रास्ते में जिसने भी यह मंजर देखा, उसका दिल दहल गया। गांव पहुंचते ही यह खबर आग की तरह फैल गई। लोगों की आंखें नम हो गईं और सभी ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर आपात स्थिति में गरीब और आदिवासी परिवारों के लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी संवेदनशील है? सवाल यह भी है कि सदर अस्पताल जैसे बड़े संस्थान में शव वाहन या एंबुलेंस की व्यवस्था क्यों नहीं हो पाई? यह घटना न सिर्फ प्रशासन की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।

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